उत्तराखंड हरिद्वार में सहस्र शिवलिंगों के तेज से आलोकित है नीलेश्वर महादेव शिवलिंग, आइए जानते है नीलेश्वर मंदिर का पौराणिक इतिहास और सत्य घटनाएं,,,,
नीलेश्वर महादेव मंदिर के दर्शन एवं विस्तृत जानकारी (वीडियो)
हरिद्वार। धर्मनगरी हरिद्वार में नील पर्वत की तलहटी और चंडी देवी मार्ग के समीप विराजमान नीलेश्वर महादेव मंदिर धर्मनगरी के सबसे प्राचीन और सिद्ध शिव तीर्थों में प्रमुख स्थान रखता है। धार्मिक दृष्टि से इस पावन धाम का उल्लेख ‘शिव महापुराण’ में भी मिलता है। इसे कनखल स्थित ऐतिहासिक दक्षेश्वर महादेव मंदिर का समकालीन माना जाता है, जहाँ वर्षभर देश के कोने-कोने से श्रद्धालु अपनी मनोकामनाएं लेकर पहुँचते हैं।
समुद्र मंथन और हलाहल विष के आचमन से पड़ा नीलेश्वर नाम
पौराणिक आख्यानों के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान जब सृष्टि को भस्म करने वाला भीषण हलाहल विष निकला, तब संपूर्ण जगत की रक्षा के लिए भगवान शिव ने इसी क्षेत्र में उसका आचमन किया था। विष के तीव्र प्रभाव से भोलेनाथ का कंठ नीला पड़ गया और आसपास का भूभाग भी प्रभावित हुआ। इसी कारण इस पर्वत को ‘नील पर्वत’ और यहाँ विराजित महादेव को ‘नीलेश्वर’ नाम से जाना गया। मान्यता है कि विष के ताप को शांत करने के लिए शिवजी यहीं से आगे नीलकंठ की ओर बढ़े थे।
माता सती के आत्मदाह और वीरभद्र के प्राकट्य का साक्षी
मंदिर से जुड़ा एक अन्य अत्यंत महत्वपूर्ण प्रसंग माता सती के आत्मदाह से जुड़ा है। कथा के अनुसार, जब कनखल में राजा दक्ष के यज्ञ कुंड में माता सती ने देहत्याग किया, तब क्रोध और विलाप में डूबे भगवान शिव इसी स्थान पर आए थे। यहाँ उन्होंने अत्यंत रोष में अपनी जटा पटकी थी, जिसके फलस्वरूप महाप्रतापी वीरभद्र का प्राकट्य हुआ था। इसके अलावा, एक लोकमान्यता यह भी है कि त्रियुगीनारायण में माता पार्वती के संग विवाह के लिए जाते समय शिव जी की बारात ने इसी शांत पर्वत शिखर पर कुछ समय विश्राम किया था।
एक जलाभिषेक से सहस्र गुना पुण्य: ढाई फीट ऊँचा स्वयंभू शिवलिंग
मंदिर के गर्भगृह में स्थापित लगभग ढाई फीट ऊँचा उत्तराभिमुख शिवलिंग स्वयंभू यानी प्राकृतिक रूप से प्रकट है। धार्मिक मान्यता है कि इस एक दिव्य शिवलिंग में एक हज़ार शिवलिंगों का तेज समाहित है। यही कारण है कि यहाँ किया गया एक जलाभिषेक श्रद्धालुओं को सहस्र (हजार) गुना पुण्य फल प्रदान करता है, जिससे यह स्थल साधना और रुद्राभिषेक के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है।
वृक्षों से फल तोड़ने पर रोक, केवल स्वतः गिरे फलों का ही लगता है भोग
नीलेश्वर महादेव मंदिर अपनी एक विशिष्ट और प्राकृतिक परंपरा के लिए भी जाना जाता है। मंदिर परिसर के आसपास कई प्राचीन फलदार वृक्ष स्थित हैं, लेकिन यहाँ लगे पेड़ों से फल तोड़ना वर्जित है। जब फल पूरी तरह पककर अपने आप धरती पर गिरते हैं, केवल उन्हीं फलों को भगवान शिव को भोग स्वरूप अर्पित किया जाता है और बाद में भक्तों में प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है।
सावन और शिवरात्रि पर दिव्य श्रृंगार देखने उमड़ता है जनसैलाब
सावन मास और महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर मंदिर में कांवड़ियों और स्थानीय भक्तों का तांता लगा रहता है। श्रद्धालु पतितपावनी गंगा से जल लाकर यहाँ विशेष रुद्राभिषेक करते हैं। विशेष रूप से संध्या काल में होने वाला शिवलिंग का मनोहारी और दिव्य श्रृंगार श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बना रहता है।

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