उत्तराखंड राजशाही पकवान से आयुर्वेदिक दवा तक जलेबी का अनोखा इतिहास, बवासीर से माइग्रेन के ईलाज तक जलेबी में छिपे हैं कई स्वास्थ्य रहस्य- वैद्य दीपक कुमार
हरिद्वार: प्रसिद्ध वैद्य दीपक कुमार ने जलेबी को केवल एक मिठाई नहीं बल्कि आयुर्वेदिक दृष्टि से उपयोगी औषधि बताते हुए इसके ऐतिहासिक, धार्मिक और स्वास्थ्य संबंधी महत्व पर प्रकाश डाला है। उन्होंने कहा कि जलेबी का उल्लेख प्राचीन ग्रंथों में मिलता है और इसे विभिन्न रोगों के उपचार तथा धार्मिक अनुष्ठानों में प्रयोग किया जाता रहा है।
राजशाही पकवान से आयुर्वेदिक औषधि तक
वैद्य दीपक कुमार के अनुसार जलेबी एक राजशाही व्यंजन रही है, जिसे दूध, दही या रबड़ी के साथ सेवन किया जाता था। आयुर्वेद में इसे कुछ विशेष रोगों के उपचार में सहायक माना गया है।
उन्होंने बताया कि- मूली के रस में जलेबी डालकर लगातार 7 दिनों तक सेवन करने से बवासीर में लाभ मिलता है।
प्राचीन काल में जलेबी का प्रयोग जलोदर (पेट में जल भरना) जैसी बीमारी के उपचार में भी किया जाता था।
दही के साथ जलेबी खाने से शुगर रोग को नियंत्रित करने में मदद मानी जाती थी।
खाली पेट दूध-जलेबी सेवन करने से वजन और लंबाई बढ़ाने में सहायक माना गया है।
माइग्रेन और सिरदर्द की समस्या में सूर्योदय से पूर्व दूध-जलेबी का सेवन लाभकारी बताया गया है।
धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व
वैद्य दीपक कुमार ने बताया कि जलेबी का धार्मिक महत्व भी अत्यंत प्राचीन है। आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा रचित देवी पूजा पद्धति में भगवती को “हरिद्रान पुआ (जलेबी)” का भोग लगाने का उल्लेख मिलता है। आज भी कई स्थानों पर माता भगवती को जलेबी अर्पित करने की परंपरा प्रचलित है।
इसी प्रकार उड़द दाल से बनने वाली इमरती को शनिदेव से जोड़ा गया है। इसे हनुमान जी, पीपल वृक्ष या शनि मंदिर में चढ़ाकर काले कौवे और कुत्ते को खिलाने से शनि दोष का प्रभाव कम होने की मान्यता है।
प्राचीन ग्रंथों में जलेबी का उल्लेख
जलेबी की विधि का वर्णन संस्कृत ग्रंथों में भी मिलता है—
पुराणों में इसे “रस कुंडलिका” कहा गया है।
भोज कुतूहल ग्रंथ में इसका नाम “जल वल्लीका” मिलता है।
“गुण्यगुणबोधिनी” ग्रंथ में भी जलेबी बनाने की विधि वर्णित है।
वैद्य दीपक कुमार के अनुसार जलेबी का कुंडली (घुमावदार) आकार मानव आंतों से संबंधित माना गया है, इसलिए इसे कब्ज जैसी समस्याओं में रामबाण इलाज बताया गया है।
स्वाद के साथ स्वास्थ्य का संगम
वैद्य दीपक कुमार का कहना है कि जलेबी केवल स्वाद का विषय नहीं, बल्कि भारतीय परंपरा में यह औषधीय, धार्मिक और सांस्कृतिक तीनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण रही है। आधुनिक समय में लोग इसे सिर्फ मिठाई के रूप में जानते हैं, जबकि आयुर्वेद में इसके उपयोग को एक संपूर्ण उपचार पद्धति के रूप में देखा गया है।


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