
हरिद्वार: श्री सिद्धपीठ दक्षिण काली मंदिर, नील धारा गंगा तट, चंडी घाट, हरिद्वार में आयोजित आचार्य महामण्डलेश्वर स्वामी कैलाशानन्द गिरि जी महाराज के पंचम सन्यास दीक्षा महोत्सव ने आध्यात्मिक चेतना के साथ-साथ सनातन मूल्यों, राष्ट्रबोध और सामाजिक दायित्व का सशक्त संदेश दिया। यह आयोजन केवल एक धार्मिक अनुष्ठान न होकर समाज और राष्ट्र के प्रति जागरूकता का प्रेरक मंच बनकर उभरा।

महोत्सव में परम पूज्य शंकराचार्य जी, आचार्य महामण्डलेश्वर स्वामी अवधेशानन्द गिरि जी, परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी, अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद अध्यक्ष महंत श्री रविन्द्र पुरी जी, आचार्य महामण्डलेश्वर स्वामी बालकानन्द जी, आचार्य लोकेश मुनि जी, आचार्य बालकृष्ण जी सहित अनेक पूज्य संतों और महापुरुषों का गरिमामयी सान्निध्य प्राप्त हुआ। संत समाज की एकता, साधना और सेवा की परंपरा इस अवसर पर स्पष्ट रूप से परिलक्षित हुई।
अपने ओजस्वी उद्बोधन में स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि लोकतंत्र में मतदान केवल अधिकार नहीं, बल्कि नैतिक और राष्ट्रीय कर्तव्य है। उन्होंने कहा कि वोट सत्ता या स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि सत्य, सनातन मूल्यों और राष्ट्र के भविष्य के लिए होना चाहिए। बांग्लादेश सहित वैश्विक घटनाओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने चेताया कि हिंसा, अराजकता और सांस्कृतिक विघटन आने वाले संकटों का संकेत हैं, ऐसे में राष्ट्र और सनातन के लिए एकजुट होकर खड़ा होना समय की मांग है।

स्वामी जी ने स्पष्ट किया कि सनातन संस्कृति ही मानवता, धर्म, पर्व-त्योहार और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ जैसे सार्वभौमिक मूल्यों की आधारशिला है। उन्होंने कहा कि जब सत्य और संस्कृति पर आघात हो, तब मौन भी मुखर होना चाहिए और राष्ट्रहित में निर्भीक होकर खड़ा होना ही सच्ची साधना है।
संतों ने अपने आशीर्वचनों में कहा कि सन्यास का अर्थ संसार से पलायन नहीं, बल्कि संसार के लिए जीना है। सन्यास स्वार्थ के त्याग, सेवा के स्वीकार और सत्य के पक्ष में निर्भीकता का नाम है। युवाओं से आह्वान किया गया कि वे आधुनिकता के साथ अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहें और राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों को समझें।
पंचम सन्यास दीक्षा महोत्सव ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि भारत को आज ऐसे नागरिकों और साधकों की आवश्यकता है जो सत्यनिष्ठ, राष्ट्रनिष्ठ और कर्तव्यनिष्ठ हों। यही सन्यास की सच्ची चेतना है और यही राष्ट्र निर्माण का मजबूत आधार।

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