आरक्षण सामाजिक न्याय से उपजे अंतर्विरोध तक – भारत में आरक्षण व्यवस्था पर एक,विशेष रिपोर्ट – गौरव चक्रपाणी (संडे स्पेशल)

नई दिल्ली। भारतीय लोकतंत्र में ‘आरक्षण’ केवल एक प्रशासनिक नीति नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव का सबसे संवेदनशील और बहुचर्चित औजार रहा है। वंचितों को मुख्यधारा में शामिल करने के संकल्प से शुरू हुई यह व्यवस्था आज सात दशकों बाद भी सामाजिक, राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर गहन विमर्श के केंद्र में है।
इतिहास के पन्नों से- रियासतों की पहल से संवैधानिक व्यवस्था तक का सफर

भारत में सकारात्मक विभेद की नींव स्वतंत्रता से पहले ही पड़ चुकी थी। 1902 में कोल्हापुर के छत्रपति शाहूजी महाराज ने गैर-ब्राह्मण और पिछड़े वर्गों के लिए 50% आरक्षण लागू कर इसे संस्थागत रूप दिया। इसके बाद 1932 के पूना पैक्ट के जरिए दलित वर्गों के लिए विधायी सीटों के आरक्षण पर सहमति बनी।
देश की आजादी के बाद, 26 जनवरी 1950 को लागू हुए संविधान के तहत अनुसूचित जातियों (SC) और अनुसूचित जनजातियों (ST) के लिए शिक्षा, सरकारी नौकरियों और विधानमंडलों में औपचारिक आरक्षण लागू किया गया। इसके बाद 1990 में मंडल आयोग की सिफारिशों के आधार पर अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को 27% आरक्षण मिला, जबकि 2019 में 103वें संविधान संशोधन के जरिए सामान्य वर्ग के गरीबों के लिए 10% आर्थिक आरक्षण (EWS) जोड़ दिया गया।
नीति के पीछे की मंशा- ऐतिहासिक अन्याय का परिहार और समान प्रतिनिधित्व

आरक्षण लागू करने के मूल में सदियों से चली आ रही जाति व्यवस्था, छुआछूत और सामाजिक बहिष्कार के ऐतिहासिक अन्याय को खत्म करना था। नीति-निर्माताओं का मानना था कि औपचारिक समानता तब तक निरर्थक है जब तक सभी वर्गों को समान प्रारंभिक बिंदु (Level Playing Field) न मिले।
प्रशासन, नौकरशाही और उच्च शिक्षण संस्थानों में वंचित तबकों की नगण्य उपस्थिति को दूर कर उन्हें राष्ट्र-निर्माण और सत्ता की साझेदारी में आनुपातिक हिस्सेदारी दिलाना इस नीति का मुख्य उद्देश्य था।
सकारात्मक बदलाव के साक्ष्य- सामाजिक और आर्थिक गतिशीलता में वृद्धि

विगत दशकों में आरक्षण नीति ने देश के हाशिए पर खड़े करोड़ों लोगों को आर्थिक संबल और सामाजिक प्रतिष्ठा दिलाई है। प्रशासनिक सेवाओं, विश्वविद्यालयों और सार्वजनिक उपक्रमों में दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्गों की भागीदारी बढ़ी है।
इसके चलते समाज में एक ऐसा मध्यम वर्ग उभरा है जिसने पहली बार व्यवस्थागत निर्णय लेने वाली प्रक्रियाओं में वंचित समुदायों की आवाज को मुखर किया।
आरक्षित वर्गों की क्रीमी लेयर का वर्चस्व- आज अंतिम व्यक्ति तक लाभ न पहुँचने की विफलता की बन रही है मुख्य वजह

आरक्षण का सबसे बड़ा संरचनात्मक दोष यह रहा है कि इसका लाभ आरक्षित वर्गों के भीतर ही केंद्रित होकर रह गया है। संपन्न और जागरूक परिवारों की नई पीढ़ियां लगातार इसका दोहरा लाभ उठा रही हैं, जबकि उसी जाति और वर्ग का सबसे गरीब, ग्रामीण और अशिक्षित तबका आज भी इस व्यवस्था की दहलीज से बाहर खड़ा है।
आरक्षण के भीतर ‘क्रीमी लेयर’ को बाहर करने और उप-वर्गीकरण की ठोस व्यवस्था के अभाव ने आरक्षित समुदायों के भीतर ही एक नई असमानता को जन्म दिया है।
सामान्य वर्ग में असंतोष, प्रतिभा पलायन और योग्यता पर उठते सवाल

कट-ऑफ अंकों में भारी अंतर और सीमित सरकारी अवसरों के कारण सामान्य वर्ग के युवाओं में गहरी निराशा और कुंठा देखी जा रही है। उच्च अंक हासिल करने के बावजूद चयन न होने की स्थिति ने युवाओं को मानसिक तनाव और व्यवस्था के प्रति आक्रोश की ओर धकेला है।
विश्लेषकों का मानना है कि इस असंतुलन के कारण देश के प्रतिभाशाली युवाओं में विदेशों का रुख करने (ब्रेन ड्रेन) की प्रवृत्ति तेज हुई है, वहीं तकनीकी और विशेषज्ञता वाले क्षेत्रों में योग्यता (Merit) की अनदेखी को लेकर भी सवाल खड़े होते रहे हैं।
भारतीय सविधान प्रारूप तैयार करने वाली मुख्य कोर टीम (ड्राफ्टिंग कमेटी)

संविधान का मूल कानूनी ढांचा तैयार करने की जिम्मेदारी 7 सदस्यीय प्रारूप समिति (Drafting Committee) की थी:
- डॉ. भीमराव आंबेडकर – अध्यक्ष
- एन. गोपालस्वामी अय्यंगार
- अल्लादि कृष्णास्वामी अय्यर
- डॉ. के. एम. मुंशी
- सैयद मोहम्मद सादुल्ला
- एन. माधव राव (बी. एल. मित्तर के स्वास्थ्य कारणों से इस्तीफा देने के बाद शामिल हुए)
- टी. टी. कृष्णामाचारी (डी. पी. खेतान के निधन के बाद 1948 में शामिल हुए)
संविधान निर्माण से जुड़ी प्रमुख भूमिकाएं और संलग्न तथ्य
भारतीय संविधान का निर्माण 2 वर्ष, 11 माह और 18 दिन के कड़े परिश्रम के बाद हुआ था। भारतीय संविधान सभा द्वारा इसे तैयार किया गया, जिसमें विभिन्न नेताओं और विशेषज्ञों की महत्वपूर्ण भूमिकाएँ थीं।
- संवैधानिक सलाहकार: सर बी. एन. राव (बेनेगल नरसिंह राव) ने लगभग 60 देशों के संविधानों का तुलनात्मक अध्ययन कर संविधान का पहला कच्चा मसौदा तैयार किया था, जिस पर प्रारूप समिति ने काम किया।
- मुख्य प्रारूपकार (Chief Draftsman): एस. एन. मुखर्जी, जिन्होंने जटिल कानूनी अनुच्छेदों की भाषा को स्पष्ट और सटीक रूप दिया।
- मूल हस्तलिखित पांडुलिपि (कैलीग्राफी): भारत का मूल संविधान मुद्रित (छपा हुआ) नहीं था। इसे प्रेम बिहारी नारायण रायजादा ने इटैलिक शैली में अपने हाथों से अंग्रेजी में लिखा था। हिंदी संस्करण का सुलेखन वसंत कृष्ण वैद्य ने किया।
- कला और सज्जा: संविधान के प्रत्येक पृष्ठ पर बनी चित्रकारी और बॉर्डर का कार्य शांतिनिकेतन के प्रसिद्ध कलाकार नंदलाल बोस और उनके शिष्यों (विशेष रूप से ब्योहर राममनोहर सिन्हा) ने संपन्न किया।
- समय और व्यय: पूरे संविधान को तैयार करने में 2 वर्ष, 11 महीने और 18 दिन लगे, जिसमें 11 औपचारिक सत्र और 165 बैठकें हुईं। इस पूरी प्रक्रिया में उस समय लगभग 64 लाख रुपये का खर्च आया था।
वोट बैंक की राजनीति और बाबा साहब का सामाजिक ध्रुवीकरण जातिविहीन समाज का सपना आज भी अधूरा

संविधान के अध्यक्ष डॉ. भीमराव आंबेडकर के दृष्टिकोण में आरक्षण के कानून का निर्माण की प्रमुख वजह एक ऐसे समाज के निर्माण की थी – जहाँ जातियों की पहचान समय के साथ मिट जाए। परन्तु इसके विपरीत, आरक्षण ने जाति को राजनीतिक लामबंदी और चुनावी जीत का सबसे सुगम माध्यम बना दिया है।
परिणामस्वरूप, कई संपन्न और प्रभावशाली सामाजिक समूह भी आरक्षण के दायरे में आने के लिए उग्र आंदोलन करने लगे हैं। इससे अंतर-जातीय कटुता, सामाजिक वैमनस्य और परस्पर अविश्वास का दायरा और अधिक गहरा हुआ है।
सदस्य संख्या का संक्षिप्त विवरण
- प्रारंभिक सदस्य संख्या (1946): कैबिनेट मिशन योजना के तहत कुल 389 सदस्य तय किए गए थे (292 ब्रिटिश प्रांतों से, 93 देशी रियासतों से और 4 चीफ कमिश्नर प्रांतों से)।
- विभाजन के बाद (1947): देश के विभाजन और पाकिस्तान के अलग होने के बाद मुस्लिम लीग के सदस्य अलग हो गए, जिससे भारत की संविधान सभा में कुल सदस्य संख्या घटकर 299 रह गई (229 प्रांतीय और 70 रियासतों के प्रतिनिधि)।
- हस्ताक्षरकर्ता (1950): 24 जनवरी 1950 को जब संविधान पर हस्ताक्षर हुए, तब सभा में उपस्थित 284 सदस्यों ने उस पर दस्तखत किए। सबसे पहला हस्ताक्षर डॉ. राजेंद्र प्रसाद और पंडित जवाहरलाल नेहरू ने किया था।
- महिला सदस्यों की भागीदारी: संविधान सभा में कुल 15 महिला सदस्य शामिल थीं (जैसे सरोजिनी नायडू, राजकुमारी अमृत कौर, हंसा मेहता, सुचेता कृपलानी, मालती चौधरी आदि)। इनमें से 8 महिलाओं ने संविधान की मूल प्रति पर हस्ताक्षर किए थे।
आगे की राह- स्थायी राजनीतिक बैसाखी या वास्तविक सशक्तीकरण?
विशेषज्ञों का स्पष्ट मत है कि आरक्षण नीति की समग्र और वैज्ञानिक समीक्षा का समय आ गया है। नीति का उद्देश्य किसी वर्ग को स्थायी रूप से सरकारी संरक्षण पर निर्भर बनाना नहीं, बल्कि उन्हें आत्मनिर्भर बनाना था।
समाधान केवल कोटे की सीमाएं बढ़ाने में नहीं, बल्कि प्राथमिक शिक्षा के स्तर पर आमूलचूल सुधार करने, वंचितों तक बुनियादी सुविधाएं पहुंचाने और आरक्षण के भीतर वास्तविक जरूरतमंदों को प्राथमिकता देने वाली पारदर्शी व्यवस्था लागू करने में निहित है।

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