August 27, 2026

उत्तराखंड देहरादून के जंगलों में चारों तरफ आई खट्टे-मीठे काफल की बहार, पर्यटकों को स्वाद और स्थानीय लोगों को मिल रहा रोजगार,,,,

उत्तराखंड देहरादून के जंगलों में चारों तरफ आई खट्टे-मीठे काफल की बहार, पर्यटकों को स्वाद और स्थानीय लोगों को मिल रहा रोजगार,,,,

देहरादून: जौनसार-बावर के हिमालयी क्षेत्रों में प्रसिद्ध औषधीय फल काफल इस बार समय से पहले पक गया है, जिससे जंगलों में इसकी अच्छी पैदावार दिख रही है। मध्यम हिमालयी क्षेत्रों का प्रसिद्ध और औषधीय गुणों से भरपूर फल काफल इन दिनों जौनसार-बावर की वादियों में अपनी खुशबू बिखेर रहा है।

देहरादून जिले के चकराता क्षेत्र में स्थित कोठा तारली, बोहा, बांदला, कोरूवा, चिबऊ और सलगा के जंगलों में इस बार लाल सुर्ख, खट्टे-मीठे रसीले काफल की अच्छी पैदावार देखने को मिल रही है।

हालांकि आमतौर पर मई के मध्य और जून में पकने वाला काफल इस बार मई की शुरुआत में ही पकने लगा था।

स्थानीय ग्रामीणों पूर्व प्रधान अनिता तोमर, प्रिंस तोमर, अक्षरा तोमर, चंदन सिंह तोमर, प्रियांशु तोमर, जालम सिंह तोमर, धर्म सिंह तोमर, महावीर सिंह तोमर, मातबर सिंह तोमर, दिनेश तोमर आदि का कहना है कि इस वर्ष मौसम के बदले मिजाज का असर नजर आ रहा है।

फलों के समय से पहले पकने की प्रक्रिया तेज हो गई है। ग्रामीणों का कहना है कि काफल केवल स्वाद के लिए ही नहीं, बल्कि पहाड़ी क्षेत्रों में आजीविका का भी सशक्त माध्यम है, क्योंकि पर्यटकों को यह फल काफी भाता है।

जंगलों से काफल एकत्र कर ग्रामीण इसे स्थानीय बाजारों और चकराता-मसूरी रोड पर बेचते हैं। इससे उन्हें अच्छी अतिरिक्त आय होती है।

रेलवे से सेवानिवृत्त चंदन सिंह तोमर ने बताया कि करीब 40 साल बाद कोठा तारली के जंगल में जाकर खुद काफल तोड़कर स्वाद चखने का अनुभव बेहद सुखद रहा। यह हमारे बचपन की यादों और हमारी संस्कृति का हिस्सा है।

वन दारोगा चांदनी नेगी ने बताया कि काफल (मायरिका एस्कुलेंटा) हिमालयी वनों की एक महत्वपूर्ण गैर-काष्ठ वन उपज है।

यह न केवल स्थानीय जैव विविधता के लिए जरूरी है, बल्कि इसमें मौजूद पोषक तत्व इसे स्वास्थ्य की दृष्टि से भी विशेष महत्व प्रदान करते हैं।

वर्तमान में काफल के पेड़ों के संरक्षण और संवर्धन व वैज्ञानिक प्रबंधन पर जोर देने की आवश्यकता महसूस की जा रही है।

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