यूजीसी के नए नियमों पर सुलगता भारत, सवर्णों की बगावत से सिहर उठी सियासत, बीजेपी के सामने अस्तित्व का संकट, विपक्ष तलाश रहा है मौका,,,

दिल्ली। उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए नियमों को लेकर उत्तर प्रदेश सहित देश के कई हिस्सों में घमासान मच गया है। इन नए ‘इक्विटी रेगुलेशंस’ के विरोध में सवर्ण समाज का गुस्सा अब सड़कों पर उतरकर एक विस्फोटक रूप ले चुका है। आगरा में ट्रैक्टरों के साथ यमुना एक्सप्रेस-वे पर कब्जा और पुलिस बैरिकेडिंग तोड़ते उग्र प्रदर्शन इस बात की गवाही दे रहे हैं कि यह मुद्दा अब महज शैक्षणिक ना रहकर एक बड़ा राजनीतिक दावानल बन चुका है।
सड़कों पर उतरी सवर्ण जातियों और छात्र संगठनों का साफ कहना है कि यूजीसी के ये नए नियम बेहद अस्पष्ट और एकतरफा हैं, जो परिसरों में सामान्य वर्ग के छात्रों को हर वक्त कटघरे में खड़ा करते हैं। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि इन नियमों के तहत बनाई जाने वाली विशेष समितियों और निगरानी के नाम पर सवर्ण छात्रों को झूठे मामलों में फंसाए जाने और मानसिक उत्पीड़न का गंभीर खतरा पैदा हो गया है, जिससे पूरे समाज में भारी दहशत और आक्रोश व्याप्त है।
इस भयंकर सियासी उबाल ने उत्तर प्रदेश के राजनीतिक समीकरणों को हिलाकर रख दिया है, जिसका सबसे बड़ा खामियाजा भारतीय जनता पार्टी (BJP) और सत्ता पक्ष को भुगतना पड़ सकता है। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य जैसी सवर्ण जातियां लंबे समय से बीजेपी की राजनीतिक रीढ़ और अचूक वोट बैंक रही हैं। लेकिन इस नीति के विरोध में जिस तरह से जमीनी स्तर पर असंतोष सुलग रहा है और स्थानीय नेताओं के इस्तीफे सामने आ रहे हैं, उसने भगवा खेमे की नींद उड़ा दी है। यदि यह नाराजगी समय रहते शांत नहीं हुई, तो पार्टी के सामने गंभीर राजनीतिक संकट खड़ा हो सकता है।

दूसरी ओर, इस राजनीतिक उथल-पुथल का फायदा उठाने के लिए विपक्षी दल पूरी तरह से सक्रिय हो चुके हैं। ‘INDIA’ ब्लॉक के दल इस सुलगते असंतोष को अपने लिए एक सुनहरा राजनीतिक मौका मान रहे हैं और बीजेपी के पारंपरिक वोट बैंक के खिसकने की उम्मीद में इस मुद्दे को लगातार हवा दे रहे हैं। वहीं, दूसरी तरफ सामाजिक न्याय के पैरोकार और दलित-पिछड़ा वर्ग के संगठन इन नियमों को परिसरों में अधिकारों और सुरक्षा की बड़ी ढाल मानकर अपनी वैचारिक धार को और तेज करने में जुट गए हैं।
उत्तर प्रदेश का सियासी इतिहास इस बात का गवाह रहा है कि जब-जब सवर्ण मतदाता ने सत्ता व्यवस्था के खिलाफ रुख अपनाया है, तब-तब लखनऊ की गद्दी के समीकरण तेजी से बदले हैं। चूंकि यह वर्ग बीजेपी की जीत का सबसे मजबूत और अकाट्य स्तंभ रहा है, इसलिए यह बगावत सीधे तौर पर सत्ता के रणनीतिकारों पर भारी पड़ती नजर आ रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि सरकार और आयोग ने वक्त रहते इस नाराजगी को दूर करने के लिए कोई ठोस संवाद या संशोधन नहीं किया, तो यह सवर्ण आक्रोश सत्ताधारी दल के लिए भारी राजनीतिक संकट साबित होगा।

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