September 26, 2026

उत्तराखंड केदारनाथ धाम में कचरे ने तोड़ा रिकॉर्ड, 5 महीने में निकला 50 मीट्रिक टन कचरा, 2025 के मुकाबले कचरे में हुई 135% की बढ़ोतरी,,,,

उत्तराखंड केदारनाथ धाम में कचरे ने तोड़ा रिकॉर्ड, 5 महीने में निकला 50 मीट्रिक टन कचरा, 2025 के मुकाबले कचरे में हुई 135% की बढ़ोतरी,,,,

देहरादून। अप्रैल से अगस्त 2026 के बीच केदारनाथ धाम में 50.30 मीट्रिक टन कचरा निकला है। ये पिछले साल के पूरे टूरिस्ट सीजन के मुकाबले ढाई गुना से ज्यादा है. नगर पंचायत के आंकड़ों के अनुसार, प्लास्टिक कचरे का दबाव भी बढ़ा है। लैंडफिल की क्षमता सीमित होने के कारण पर्यावरण पर खतरा बढ़ रहा है।

केदारनाथ धाम से इस साल कचरे के बढ़ते आंकड़े चिंता बढ़ा रहे हैं. दरअसल, अप्रैल से अगस्त 2026 के बीच यहां 50.30 मीट्रिक टन कचरा निकला है। यह कचरा पिछले साल पूरे टूरिस्ट सीजन में जुटाए गए कचरे से ढाई गुना से भी ज्यादा है।

यह जानकारी नगर पंचायत ने आरटीआई के जवाब में दी है. दरअसल, नोएडा के आरटीआई कार्यकर्ता अमित गुप्ता ने केदारनाथ में कचरे को लेकर यह सवाल उठाया था। जवाब मिलने के बाद केदारनाथ की सफाई व्यवस्था और पर्यावरण पर फिर बहस शुरू हो गई है।

🔴 पिछले तीन सालों के मुकाबले तेजी से बढ़ा कचरा


नगर पंचायत की ओर से जारी आकंड़ो के मुताबिक केदारनाथ में 2023 में 32.58 मीट्रिक टन कचरा निकला था. 2024 में यह आंकड़ा 26.10 मीट्रिक टन रहा। 2025 में कचरा और घटकर 21.40 मीट्रिक टन रह गया था। लेकिन 2026 में सिर्फ पांच महीनों में ही 50.30 मीट्रिक टन कचरा निकल गया।

2026 का यह आकंड़ा 2023 के कुल कचरे से करीब 54 प्रतिशत ज्यादा है। 2024 के मुकाबले यह लगभग 93 प्रतिशत ज्यादा है. 2025 की तुलना में यह करीब 135 प्रतिशत ज्यादा है।

महीनेवार आंकड़े भी यही कहानी बता रहे हैं. अप्रैल 2026 में 1.7 मीट्रिक टन कचरा निकला। मई में यह बढ़कर 16.3 मीट्रिक टन हो गया। वहीं जून में 11.5 मीट्रिक टन, जुलाई में 10.5 मीट्रिक टन और अगस्त में 10.3 मीट्रिक टन कचरा दर्ज किया गया। मई का आंकड़ा सबसे ज्यादा रहा। इससे साफ है कि तीर्थयात्रियों की संख्या बढ़ने के साथ कचरा भी तेजी से बढ़ रहा है।

🔴 पहाड़ी इलाकों में प्लास्टिक का निपटान भी मुश्किल


नगर पंचायत ने प्लास्टिक कचरे का भी ब्योरा दिया है. इन आकंड़ों के मुताबिक, 2026 में अब तक करीब 20 मीट्रिक टन प्लास्टिक कचरा निकला है. इसमें से 18.5 मीट्रिक टन, यानी 92.5 प्रतिशत, प्रोसेस कर दिया गया है. करीब 1.5 मीट्रिक टन प्लास्टिक अभी बचा हुआ है. यह आंकड़ा बताता है कि प्लास्टिक का दबाव भी कम नहीं है. पहाड़ी इलाकों में प्लास्टिक का निपटान और भी मुश्किल हो जाता है।

नगर पंचायत का कहना है कि केदारनाथ में लैंडफिल की कुल क्षमता 30,000 वर्ग फुट है। इसमें 28,000 वर्ग फुट जगह अभी बची हुई है. पिछले पांच साल में केदारनाथ में चार लैंडफिल बनाए गए हैं। लेकिन आरटीआई कार्यकर्ता अमित गुप्ता का कहना है कि बढ़ते कचरे के बीच लैंडफिल पर निर्भरता हिमालयी पर्यावरण के लिए खतरनाक हो सकती है. इतने संवेदनशील क्षेत्र में यह हाल किसी गंभीर चेतावनी से कम नहीं है।

आरटीआई कार्यकर्ता अमित गुप्ता ने कहा कि इस साल अब तक करीब 15 लाख श्रद्धालु केदारनाथ पहुंच चुके हैं. इतनी बड़ी भीड़ से वहां की सफाई और कचरा प्रबंधन व्यवस्था पर दबाव और बढ़ गया है। गुप्ता ने कहा कि हमें ही अपने पवित्र और संवेदनशील तीर्थ स्थान को कचरे का ढेर बनने से बचाना होगा। यात्रा व्यवस्था के साथ पर्यावरण सुरक्षा को भी उतनी ही गंभीरता से लेना होगा।

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