September 18, 2026

उत्तराखंड विधानसभा बर्खास्तगी मामले  में हाईकोर्ट ने खारिज किया प्रार्थना पत्र, 15 अक्टूबर को होगी अब अगली सुनवाई,,,,

उत्तराखंड विधानसभा बर्खास्तगी मामले  में हाईकोर्ट ने खारिज किया प्रार्थना पत्र, 15 अक्टूबर को होगी अब अगली सुनवाई,,,,

नैनीताल। उत्तराखंड विधानसभा सचिवालय से बर्खास्त किए गए कर्मचारियों के मामले में नैनीताल हाईकोर्ट में बुधवार को सुनवाई हुई। अदालत ने हटाए गए कर्मचारियों की ओर से 2016 से पहले नियुक्त कर्मचारियों से संबंधित दस्तावेज कोर्ट में पेश करने की अनुमति मांगने वाले प्रार्थना पत्र को सुनवाई के बाद निरस्त कर दिया है। इसके साथ ही, कोर्ट ने 2016 से पहले नियुक्त कर्मचारियों के दस्तावेज शपथपत्र के माध्यम से पेश करने और विधानसभा सचिवालय को इस पर आपत्ति दर्ज कराने के निर्देश दिए हैं। मामले की अगली सुनवाई के लिए 15 अक्टूबर की तिथि तय की गई है।

🔴 याचिकाकर्ताओं और विधानसभा सचिवालय के तर्क

  • याचिकाकर्ताओं का पक्ष: न्यायमूर्ति रवींद्र मैठाणी की एकलपीठ में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ताओं ने दलील दी कि उनकी नियुक्तियां पूरी तरह वैध हैं और विधानसभा अध्यक्ष को नियुक्तियां करने का अधिकार प्राप्त है। बबिता भंडारी, भूपेंद्र सिंह और कुलदीप सिंह सहित 225 अन्य बर्खास्त कर्मचारियों ने अपनी याचिका में कहा कि विधानसभा अध्यक्ष ने लोकहित का हवाला देते हुए 27, 28 व 29 सितंबर 2022 को उनकी सेवाएं समाप्त कर दी थीं। बर्खास्तगी के आदेश में हटाने का कोई ठोस आधार नहीं बताया गया और न ही उनका पक्ष सुना गया, जबकि उन्होंने नियमित कर्मचारियों की तरह कार्य किया था।

  • विधानसभा सचिवालय का पक्ष: वहीं, विधानसभा सचिवालय की ओर से कड़ा विरोध जताते हुए कहा गया कि सभी अवैध नियुक्तियों को नियमानुसार ही हटाया गया है। सचिवालय के अनुसार, ये नियुक्तियां बिना किसी नियमावली का ध्यान रखे और बिना विज्ञप्ति जारी किए पिछले दरवाजे से 228 पदों पर की गई थीं, तथा विधानसभा अध्यक्ष को ऐसी नियुक्तियां करने का कोई अधिकार नहीं था।

🔴 पुराने मामलों का हवाला और भेदभाव का आरोप

​कर्मचारियों की ओर से कोर्ट में यह भी तर्क दिया गया कि विधानसभा सचिवालय में वर्ष 2001 से 2005 के बीच पिछले दरवाजे से 396 पदों पर नियुक्तियां हुई थीं, जिन्हें बाद में नियमित कर दिया गया। इसके अलावा वर्ष 2014 तक के तदर्थ कर्मचारियों को चार साल से कम की सेवा अवधि में नियमित कर दिया गया, जबकि छह वर्ष से अधिक सेवा देने के बावजूद उन्हें नियमित करने के बजाय बर्खास्त कर दिया गया।

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