September 13, 2026

“ग्लेशियर झीलों की निगरानी के लिए स्वदेशी तकनीक तैयार, खतरे से एक घंटे पहले मिलेगा अलर्ट””

“ग्लेशियर झीलों की निगरानी के लिए स्वदेशी तकनीक तैयार, खतरे से एक घंटे पहले मिलेगा अलर्ट””

​देहरादून:उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियर झीलों के टूटने से आने वाली तबाही को रोकने के लिए वैज्ञानिकों ने बड़ी सफलता हासिल की है। केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान (CBRI), रुड़की ने चमोली जिले की अति-संवेदनशील ग्लेशियर झीलों की निगरानी के लिए एक अत्याधुनिक स्वदेशी अर्ली वार्निंग सिस्टम विकसित किया है। यह प्रणाली ग्लेशियर झील फटने (GLOF) जैसी संभावित आपदा से लगभग एक घंटे पहले चेतावनी जारी करेगी, जिससे निचले इलाकों में सुरक्षा उपाय करने का पर्याप्त समय मिल सकेगा।

​🔴अत्याधुनिक सेंसर और 24 घंटे रियल-टाइम ट्रैकिंग

​यह तकनीक पूरी तरह स्वदेशी है और 24 घंटे रियल-टाइम डेटा प्रदान करेगी। इसके लिए झीलों के पास विशेष मॉनिटरिंग टॉवर लगाए जा रहे हैं, जो अत्याधुनिक सेंसर और हाई-रिज़ॉल्यूशन कैमरों से लैस हैं। ये सेंसर क्षेत्र में बारिश, बर्फबारी, पानी के बहाव और झील के आकार में हो रहे बदलावों पर लगातार नजर रखेंगे। यदि झील में कोई बड़ा हिमखंड गिरता है या प्राकृतिक बांध में दरार आती है, तो सेंसर महज 1 से 2 मिनट के भीतर डेटा और तस्वीरें कंट्रोल रूम तक भेज देंगे।

🔴​वसुंधरा ताल से होगी प्रोजेक्ट की शुरुआत

​इस परियोजना के पहले चरण में चमोली जिले में स्थित वसुंधरा ताल को चुना गया है, जहां इस सिस्टम को स्थापित किया जा रहा है। वसुंधरा ताल की सफलता के बाद राज्य की अन्य संवेदनशील ग्लेशियर झीलों, जैसे सरस्वती ताल और केदारताल में भी चरणबद्ध तरीके से इस तकनीक का विस्तार किया जाएगा।

🔴​तीन प्रमुख संस्थानों से जुड़ेगा कंट्रोल रूम

​प्रणाली से प्राप्त होने वाले डेटा की सीधी मॉनिटरिंग के लिए मजबूत नेटवर्क तैयार किया गया है। इसका कंट्रोल रूम CBRI रुड़की, वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्थान (देहरादून) और उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (USDMA) से जुड़ा रहेगा। आपदा की आहट मिलते ही ये संस्थान तुरंत अलर्ट जारी कर स्थानीय प्रशासन और आम जनता को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने की कार्रवाई शुरू कर सकेंगे।

ऐसे में यह अर्ली वार्निंग सिस्टम संवेदनशील क्षेत्रों में समय रहते चेतावनी जारी कर जान-माल के नुकसान को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। इस तकनीक के डिजाइन और विकास में वैज्ञानिक चंद्रभान पटेल, कांति एल. सोलंकी और डॉ. डी.पी. कानूनगो की प्रमुख भूमिका रही है।

 

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