“राजनीति” फॉर्म-6 को मंजूरी नहीं, आयोग के फैसले में सामूहिक सहमति न मिली तो रद्द होंगे फैसले- सुप्रीम कोर्ट,,,,

नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) ने मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया है कि यदि आयोग द्वारा लिए गए निर्णय सर्वसम्मति या विधिसम्मत बहुमत के बिना पाए गए, तो उन्हें रद्द किया जा सकता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यद्यपि सीईसी को पद से हटाने की मांग पर वह फिलहाल कोई अंतरिम आदेश नहीं दे रही है, लेकिन आयोग के फैसलों में तय कानूनी प्रक्रिया का पालन अनिवार्य है।
एकतरफा फैसलों के आरोपों पर केंद्र और चुनाव आयोग को नोटिस

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह और अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने दलील दी कि मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) से जुड़े लगभग 14 महत्वपूर्ण फैसले अकेले मुख्य चुनाव आयुक्त द्वारा लिए गए, जबकि दोनों साथी चुनाव आयुक्तों ने उन पर लिखित असहमति जताई थी। इस पर जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने केंद्र सरकार, चुनाव आयोग, सीईसी ज्ञानेश कुमार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी सहित अन्य वरिष्ठ अधिकारियों को नोटिस जारी कर एक सप्ताह में जवाब तलब किया है।
“अगर हमने सीईसी को हटा दिया तो चुनाव कौन कराएगा”, कोर्ट की तीखी टिप्पणी

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से सीईसी को निलंबित करने की मांग पर पीठ ने व्यावहारिक सवाल उठाते हुए कहा:
“अगर हमने सीईसी को निलंबित कर दिया तो चुनाव कौन कराएगा? क्या बाकी दो आयुक्त चुनाव करा सकते हैं? कानून की अपेक्षा है कि संस्थागत व्यवस्था बनी रहे।”
अदालत ने आगे कहा कि किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले दूसरे पक्ष को सुनना आवश्यक है। यदि रिकॉर्ड से यह साबित होता है कि फैसले सर्वसम्मति या नियमानुसार नहीं लिए गए हैं, तो अदालत उन्हें अधिकार क्षेत्र से बाहर मानकर रद्द करने में संकोच नहीं करेगी।
आयोग का पक्ष, 27 मई के आदेश का दिया हवाला

दूसरी ओर, चुनाव आयोग की ओर से कहा गया कि 24 जून 2025 को बिहार में एसआईआर का आदेश सर्वसम्मति से लिया गया था और फॉर्म-6 के साथ अतिरिक्त शपथपत्र जोड़ने की अनुमति सुप्रीम कोर्ट ने 27 मई 2026 के अपने आदेश में पहले ही दी थी।
क्या कहता है कानून?

- सर्वसम्मति या बहुमत अनिवार्य: मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और पदावधि) अधिनियम 2023 की धारा 18 के तहत आयोग का कामकाज जहां तक संभव हो सर्वसम्मति से होगा। मतभेद की स्थिति में बहुमत (2:1) की राय ही मान्य होगी।
- संरक्षण केवल राष्ट्रपति को: अधिनियम की धारा 16 के संदर्भ में दलील दी गई कि न्यायिक संरक्षण प्रक्रियागत त्रुटियों को नहीं ढकता; कानूनन आयोग को संस्थागत नियमों का पालन करना ही होगा।

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